Wednesday, December 05, 2012

उड़े परिन्दे


उड़े परिंदे-
सूर्यदेव पाठक 'पराग' षरतीय साहित्य संस्थान १८१, आवास विकास कॉलोनी-१, शाहपुर, गोरखपुर उ०प्र०, प्रथम संस्करण २००१, पेपर बैक, पृष्ठ ४८, मूल्य ३५ रुपए



हाइकु कविता धीरे-धीरे हिन्दी साहित्य में स्थापित होती जा रही है। पत्र-पत्रिकाओं में हाइकु गीत देखने को मिल जाते हैं। प्रायः हाइकु गीतों में हाइकुकार एक ही भाव भूमि की अतुकान्त हाइकु रचनाओं को शामिल कर देते हैं और उसे ‘हाइकु गीत’ का नाम दे देते हैं। ऐसा लगता है कि ऐसे हाइकुकार स्वयं तो भ्रम में हैं ही साथ ही हाइकु पाठकों को भी भ्रम में डालते हैं।
सूर्यदेव पाठक ‘पराग’ का हाइकु गीत संग्रह ‘उड़े परिन्दे’ प्रकाशित हुआ है। यह अपनी तरह का पहला हाइकु गीत संग्रह है। इस संग्रह के हाइकु गीत पूरी तरह से श्रेष्ठ गीत हैं जिन्हें हाइकु कविता के अनुरूप 5-7-5 अक्षर क्रम का निर्वाह करके रचा गया है। संग्रह में कुल 22 हाइकु गीत हैं। इन गीतों में प्रवाहात्मकता, लयात्मकता और गेयता का पूरा ध्यान रखा गया है। उड़े परिन्दे के हाइकु गीत आदर्श हाइकु गीत कहे जा सकते हैं। यदि इस प्रकार के हाइकु गीत पाठकों तक पहुँचें तो निश्चय ही वे इन्हें पसन्द करेंगे। हाइकु गीत लिखने की कोशिश करने वालों को ‘उड़े परिन्दे’ अवश्य पढ़नी चाहिये। संग्रह का प्रथम हाइकु गीत दृष्टव्य हैं-
तपती रेत   / जल रही धरती / मेघा आ जा रे !
झुलस गए / तरु-तरु के पत्ते / हो पीले-पीले ।
फटे-फटे से / वक्ष खेत के, अब / न रहे गीले
थके परिन्दे / आ जा, शीतल जल / बरसा जा रे
तुम चाहो तो / इन्द्रधनुष चूमे / प्यासी धरती
तुम चाहो तो / जल से भर जाये / सारी धरती
श्याम सलोने / आसमान में घिर / न लजाजा रे । (पृ0-05)
पुस्तक का मुद्रण त्रुटि रहित है। अच्छे स्तर के कागज का प्रयोग किया गया है। पेपर बैक संस्करण 48 पृष्ठ का मूल्य 35 रुपए है जो उचित है।

-(हाइकु दर्पण, अंक - 03 से साभार)



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